Monday, 17 November 2014

सियासत

सियासत के खेल में
क्या मिला क्या पता किसको?
हम चिल्लाते रहे
बंजर जैसी जमींन पे हमारे

हर कोई दिखाता है
अच्छे दिनों के सपने
फिर क्यों हजारो सालो से
लढ़ रहे है अपने

झेंडे बढ़ रहे है
चेहरे पहचानते है हम
सभी तो है अपने
फिर क्यों दोषी समजते है हम

हमारी जिंदगी हो हरियाली
वजूद है हम सब का
क्या कोई दिखा दे
क्या अपराध है हम सब का

आओ चले अब दिखा दे
प्रकृती  साथ है
चलो चले हिला के रख दे
प्रगती के साथ है

राजू ठोकळ
13.10.2014

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